खूनी ढ़ाबा

                                                            खूनी ढ़ाबा 



उस रोज बारिश बहुत जोरो से बरस रही थी, चारो तरफ घने अंधेरे छाय हुए थे । उसी अंधेरे में रमेश की कार इस घने अंधेरे को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था जिसे खुद रमेश ही चला रहा था और बगल वाली सीट पर उसकी पत्नी पूजा बैठी थी , जो एक नामी चैनल की जर्नलिस्ट थी।   


"बोला था न दोपहर में ही घर के लिए निकल जाने को अब रात हो गई न और ऊपर से मौसम भी खराब हो गया"  रमेंश ने चीड़-चिड़े आवाज में अपनी पत्नी पूजा से बोला ।



"माना कि मुझसे लेट हुई लेकिन वो भी तो ठीक समय था वो रास्ते मे जाम के कारण ही तो लेट हुई न और ऊपर से तुम ये पता नही कैसे रास्ते मे गाड़ी को ला दिए हो जहाँ कोई परिंदा तक भी नही है, खुद पर गुस्सा करो न, क्यों नही करते।

अपनी गलती किसी को नजर नही आती" पूजा मानो एकदम बड़बड़ाये जा रही थी ।



रमेश-"अब चुप भी करो , चलो माना कि ये भी गलती मेरी थी अब शांति से गाड़ी तो चलाने दो और हाँ ये रास्ता शॉर्टकट है इससे हम पहले पहुँचगे। 



गाड़ी तेज गति से सुनसान सड़क पर बढ़ते जा रही थी, जिसके दोनों ओर घने जंगल थे। अचानक से चलते-चलते गाड़ी की हेड लाईट बन्द हो जाती है जिससे रास्ते मे फैली रौशनी एकदम से अंधेरे में बदल गई ऐसा होने से गाड़ी के तेज गति के कारण रमेश अपनी संतुलन खो बैठता है जिससे रास्ते का अंदाजा न होने के कारण गाड़ी जोरदार झटके के साथ एक पेड़ से टकरा गई और गाड़ी वही बन्द हो गई।



ये घटना इतना अचानक से हुई की किसी को भी सम्हलने का वक्त नही मिला । चारो तरफ घोर अंधेरा और गहरा काला दिखने वाला रात अब इन दोनों को भी अपनी आगोश में ले चुका था , अब बारिश और तेज हो चुका था बादलों की सिंह गर्जना मानो कानो के पर्दे फाड़ दे , रह रह कर तेज आवाज के साथ बिजली चमक रही थी, जिससे कुछ क्षण के लिए रौशनी पूरे जंगल के फैल जाती और जंगल के भयानक दृश्यों को चित्र नग्न आँखो में उभार देती।

                     ऊपर से जंगली जानवरों की आवाजें मानो पूरे माहौल को डरावना बना रहा था।

                     " हे भगवान ये कैसी विपदा में डाल दिये", रमेश बुदबुदाय जा रहा था। अब उसके सामने वो स्थिति थी कि बिना बाहर निकले काम नही चलने वाला था। वो कहते है न बिन कोशिश कुछ काम न साधे , बिल्कुल वही स्थिति सामने थी कोशिश भी ऐसी की जिसे करने में शरीर का रोम-रोम कांप जाए। लेकिन करनी तो पड़ेगी ही ,बिना इस भयानक जंगल से निकले  जंगल मे रात भर जीवित नही रहा जा सकता क्योंकि , रमेश को चोर-लुटेरों का डर सता रहा था क्योंकि उसके पास पैसे और बहुत सारे गहने-जेवर थे।

                लेकिन उस बेचारे को क्या पता कि इस जंगल मे उसे इंसानी चोर से नही बल्कि ऐसे शक्तियों से सामना होने वाली है जिसकी भय सारी जीवन नही भूल सकता कोई।

इन सब से अनजान वो कार के दरवाजे को खोलता है गाड़ी की दशा देंखने जाने के लिये। 

                         तभी...............................


दरवाजे के तरफ मुड़ते ही अचानक रमेश को लगता है कि खिड़की के शीशे से दो अंगार बरश्ते लाल निगाहे उन पर अपनी नजर रखी हुई थी। 

                                            जिसे देख  वो एक दम से डर जाता है उसकी शरीर भय से एक पल के लिय कांप जाती है। और उसके मुख से अचानक एक जोरदार चीख निकल पड़ती है। 

   

"क्या हुआ रमेश , पूजा घबराय हुए पूछती है"।

कुछ पल के लिए रमेश कोई जवाब नही देता और जब सच बोलता है, तो पूजा बिल्कुल निर्जीव सी हो कर उसे देखे जा रही थी। अब रमेश से ज्यादा उसके ऊपर डर सवार था। उसके शरीर कांप रहे थे । रमेश के बार-बार बोलने के बादः भी उसके मुख से आवाजे नही निकल रही थी। बिल्कुल एक काठ की मूर्ति की तरह , ऐसा प्रतीत होने लगा कि उसकी जान निकल चुकी है। ये देख रमेश और घबरा जाता है।

और तब रमेश को लगा ऐसी बाते इसे नही बतलानी चाहिए थी, फिर वो बातो को बदलने की कोशिश करने लगा । "मैं भी कितना मूर्ख हूँ इतना पढा लिखा होकर भी ऐसी बातो पर विश्वास कर रहा हूँ । ये तो मेरा सिर्फ बहम था। और पूजा तुम भी मेरी इन फालतू की बातो में आ गई यार तुम खुद एक जर्नलिस्ट हो इतनी पढ़ी-लिखी हो पर ऐसे बातो पर विश्वास कर रही हो और जरा सोचो कौन इतनी तेज बारिश में रहेगा ऊपर से इतनी रात को यार भूतों को भी तो बारिश से बचना पड़ेगा न बेचारे गीले हो जाएंगे" , ये बोलता हुआ अपनी मुख पर एक झूठी मुस्कान लाकर रमेश ये दिखाने की कोशिश कर रहा था कि ये महज एक भ्रम था। लेकिन डर उसके अंदर भी बैठ गया था। लेकिन करे भी तो क्या करे , पुरुष ही तो था और एक स्त्री अपने पति के साथ हो और पत्नी के डर में यदि पति भी शामिल हो जाये तब तो पत्नी का सहारा ही खत्म हो जाता है। ये दुनिया की रीत है। 

                    "अच्छा छोड़ो इन फालतू की बाते , मैं देखता हूँ गाड़ी को क्या हुआ है। "
"नही तुम अभी मत जाओ अभी मुझे डर लग रहा है। जब सबेरा होगा तो हम देखेगे।" पूजा बोले जा रही थी।



"अरे बाबा रुक जाता हूँ , पड़े रहेंगे हम रात भर यही । यार तुम  भी न दिन रात - लोगो को अपने पकाऊ खबरों से मूर्ख बनाते रहती हो और आज तुम मेरे इस फालतू की बातो से मूर्ख बन रही हो ।" रमेश बोला



                  "अच्छा मैं लोगो को मूर्ख बनाती हूँ ," पूजा चिढ़ते हुए बोल रही थी।



अब दोनों हँसते हुए एक दूसरे की माजक उड़ाए जा रहे थे।

रात्रि अपने चरम स्थिति यानी मध्यस्ता से गुजर रही थी। अब तापमान भी घटता जा रहा था जिससे ठंड की अनुभूति ज्यादा होने लगी थी। दोनों एक दूसरे से बातें करते और भी नजदिक आ चुके थे । अब दोनों एक दूसरे की सांसों की गर्माहट आसानी से महसूस कर रहे थे। जैसे वो और करीब हुए। तभी एक जोर का झटका कार में लगा ऐसा लगा मानो कोई भूकंप का झटका हो दोनों इस झटके से एक दम सहम गए। 

दोनों ये सोच रहे थे आज उनके साथ ये क्या हो रहा है। कुछ पल अचेत बने रहने के बाद कोई हरकत नही हुई । अब बारिश रुक चुका था, लेकिन ठण्डपन मौसम में बनी हुई थी। अचानक से दोनों की नजर एक बूढ़े व्यक्ति पर जाती है जो कार के थोड़े ही दूरी से हाथों में लालटेन लिए रॉड क्रोस कर रहा था। 

उसे देख इन्हें कुछ मदद की आश जगी , रमेश के मानो चिंता की लकीरें ही मिटने वाली थी, की तभी पूजा बोल पड़ी "इतनी रात में ये बूढ़ा व्यक्ति कहाँ जा रहा है और यहाँ दूर-दूर तक कोई गांव भी नजर नही आ रहे है। "

पूजा की बाते रमेश को ठीक तो लगी पर

पूरा ठीक नही क्योंकि उसे सिर्फ यहाँ से ठीक- ठाक घर पहुँचना था वो भी सुबह होने से पहले। कई दिनों से छुटियां मनाने दोनों पति-पत्नी उत्तराखंड की सैर पर निकले थे। जितने दिन की रमेश ऑफिस से छुट्टी ले रखा था उससे वो दो दिन लेट था । बॉस के बार -बार कॉल आ रहे थे उसने कल सुबह निश्चित ऑफिस जाने का वादा भी कर दिया था। यदि वो समय पर नही पहुँचता है तो उनकी नौकरी खतरे में पड जाने वाली थी।


" नही यार आस-पास कोई गांव होगा जंगली इलाके में ऐसे ही गांव होते है , जंगल के कारण पता भी नही चलता कि यहाँ गांव भी है " रमेश पूजा से निडरता से बोलता है।

" लेकिन रमेश अभी जो झटका था वो क्या था" पूजा।

"वो भूकम्प ही होंगा ये सब पहाड़ो और जंगलों की आम बातें है।" रमेश पूजा को समझता है।



लेकिन रमेश की बाते पूजा के पल्ले नही पड़ती फिर भी रमेश उस बूढ़े से मदद की गुहार लगाने के लिए उतावला होता है । वो पूजा की पूरी बातें सुने बिना ही कार के दरवाजे खोलता है और उस बूढ़े व्यक्ति की ओर ऐसा भागता है जैसे उसकी कोई सामने से ट्रेन छूट रही हो और वो यात्री बने उसके पीछे उसे पकड़ने को दौड़

लगा रहा हो।

रमेश की मनोदशा ये बता रही थी कि वो कैसे इस घने अंधेरे जंगली मुसीबत से छुटकारा पाए, 

बिल्कुल ऐसा ही मनोदशा पूजा के भी साथ थी। दोनों जल्दी - से -जल्दी इस मुसीबत से छुटकारा पाना चाहते थे। 

रमेश के बाहर निकलते ही पूजा भी उसके पीछे भागने लागी। दोनों उस बुढे व्यक्ति की तरफ तेजी से बढ़ने लगे। रमेश ने आवाज लगाई, "चाचा जी जरा ठहरिए। " उनकी आवाज सुनकर को बूढ़ा व्यक्ति रूक गया । और एक विचित्र- सी मुस्कान लिए पूछता है "क्या हुआ बेटा "। 

उसकी आवाज में एक अजीब क्रूरता थी, जिसे सुन कर दोनों के अंदर एक डर फिर से जन्म ले लेता है। उस बूढ़े व्यक्ति का चेहरा ऐसा लग रहा था मानो आधा जला हुआ हो, आँखे अंगारे बरसाते हुए प्रतीत हो रही थी। रमेश को भी उसका चेहरा देख ऐसा लगता है कि इन आँखों को कही देखा है । लेकिन उसके मस्तिक में वो पुरानी जगह याद नही आ पाता जहाँ उसने उस बूढ़े व्यक्ति जैसी आँखे देखा था।
खैर इन सब बातों को किनारा करते हुए । रमेश ने पूछ दिया बाबा , "यहाँ आस - पास कोई गैरेज है क्या जहाँ से मैं मैकेनिक् को लाकर अपनी गाड़ी बनवा सकूं। "
" नही यहाँ तो दूर - दूर तक कोई गैरेज नही है। लेकिन तुम सब एक काम करो यही से कुछ दूरी पर एक ढाबा है जहाँ पर तुम्हे रुकने की जगह मिल जाएगी । वही चले जाओ , ये जगह ठीक नही है। यहाँ रहे तो ...... ।"इतना बोल कर वो बुढ़ा व्यक्ति चुप हो जाता और फिर सब जंगल की ओर बढ़ने लगता है।



लेकिन उसके बोले तो .... का मतलब जानने की जिज्ञासा से घबराए हुए आवाज लगते है और वो बढ़ा व्यक्ति बिना पूछे मुड़े दूर कही जंगल मे उनकी नजरो से ओझल हो जाता है। 

ये दोनों पति-पत्नी निराशा भरी नजरों से सिर्फ उसे फिर से जंगल की ओर तलास रहे थे । पर उनकी लाख कोशिशों के बाद भी वो नही मिला।

इनकी अब बेचैनियां और बढ रही थी। अब इन्हें समझ नही आ रहा था कि यही रुका जाए या उस बूढ़े व्यक्ति की बात मानी जाए।



दोनों बस टकटकी लगाय एक दूसरे के चेहरे को निहार रहे थे अब ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो अपने सोचने की क्षमता ही खो बैठे हो , न चाहते हुए भी उन्हें उस बूढ़े व्यक्ति के बताए बातो को मानना था , इसके सिवा और कोई रास्ता भी तो नही था, एक रास्ता यानी गाड़ी में ही रुकना बचा था उसपर भी बूढ़े ने कुछ नकारात्मक  सोच लगा दिया।

                     दोनों पति-पत्नी आगे क्या करना है इसके बारे में मंथन कर रहे थे। चारों तरफ फिर से एक डरावनी सन्नाटा छा गया, ऐसा भयानक खामोशी जिसमे एक दूसरे की साँसों  की आवाजें भी असानी से सुनी जा सकती थी। तभी इस डरावने खामोशी को चीरता हुआ रमेश बोल पड़ा, "चलो एक बार उस बेचारे बूढ़े की भी बातें मान कर देखते है चलते है उस ढाबे की ओर !"  " तुम्हें क्या लगता है उसकी बातें माननी उचित है ? क्या तुम्हें उसकी आँखों में वो धधकती वो ज्वाला नही दिखी क्या जिसमे हमे ही अपना निशाना बनाये हुए थी। रमेश मुझे बहुत डर लग रहा है।" पूजा डरते-डरते बोले जा रही थी।  

                          पूजा अब ऐसे ही डरने से कुछ हो सकता है तो बोलो? और उस व्यक्ति के बताए रास्ते के अलावा भी और कोई उपाय है क्या जिससे हम दोनों सुरक्षित घर पहुँच जाए? रमेश ने सवालिया अंदाज में पूजा से पूछा। 

पूजा ने सिर ना में हिलाकर रमेश के प्रश्नों का जवाब क्षण भर में दे दिया।  अब दोनों उस बूढ़े के बताए दिशा में बढ़ने लगे जहां उसने ढाबा होने की बात बोली थी। कुछ ही दूरी तय करने पर एक रोशनी सी दिखी , शायद ये एक लालटेन की रौशनी थी । दोनों के अंदर कुछ हिम्मत आयी, क्योंकि ये महज एक रौशनी नही बल्कि उनकी सुरक्षित होने की एक आशा की किरण भी थी लेकिन ये सिर्फ इनकी समझ से, और दूसरी बात की उस बूढ़े व्यक्ति की बाते सत्य साबित हो रही थी। दोनों उस रौशनी की ओर तेजी से बढ़ते रहे। 

                            और कुछ ही पलों में वो उस ढाबे के करीब थे । ढाबा बाहर से बहुत पुराना जान पड़ रहा था , बाहर एक लालटेन टंगी हुई थी। जिसकी रौशनी ढाबे के अलावा महज कुछ ही दूरी तक सीमित थी, लेकिन वहाँ कोई और मौजूद नही था। इस ढाबे को देखकर ऐसा लगता था कि वर्षो से यहाँ कोई इंशान का आगमन ही न हुआ हो सभी दीवारों पर मकड़ी की जाले फैली हुई थी। लेकिन एक खास बात थी इस ढाबे में अंदर दो रूम बने हुए थे जिसकी दरवाजे बहुत पुरानी थी दरवाजे में कई छेद भी थे जिसके अंदर से बाहर की ओर रौशनी आ रही थी ,जो वहाँ किसी के होने की मौजूदगी थी।  जिसे देख दोनों अंदर जाने की हिम्मत जुटाते है । दरवाजा भीतर से बंद था रमेश ने पहले आवाज लगायी पर कोई नही आया , कुछ कोशिश करने के बाद दरवाजा चर्र चर्र..…....की आवाज के साथ खुलता है अंदर से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति पुराने साल ओढ़े हुए बाहर आता है। 

                     वो व्यक्ति देंखने में एकदम ऐसा लग रहा था जैसे सालो से नहाया न हो , उसकी चेहरे तो मासूम से लग रहे थे गालों पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी। लेकिन आँखे मानो जलती हुई चिता की अंगारे उसमें समाई हो, निकलते ही मुख पर एक तीखी मुस्कान लिये बोल पड़ा "आइए- आइए आप लोगो का  ही इंतेजार कर रहा हूं कब से।"
                  "इंतेजार वो भी हमारा"  रमेश चकित आवाज में उस व्यक्ति से पूछता है। 
                   नही ..नही मेरा कहने का मतलब यह है कि मैं यहाँ यात्रियों के इंतेजार में ही बैठा रहता हूँ । उनकी मदद के लिये । उस व्यक्ति ने अपनी बातें बदलते हुए बोला। 



लेकिन अब पूजा और रमेश एक दूसरे को सहमे-सहमे देखते रहते है । कुछ देर के शांति के बाद रमेश बोला "भाई साहब हमे रात गुजारने के लिए एक कमरा आप दे सकते है क्या?"

रमेश के इस सवाल जैसे आग्रह पर उस व्यक्ति ने बोला "मैं तो पहले ही बोल दिया कि हम यहां अनजान यात्रियों के मदद के लिए ही हूँ । आप दोनों कमरे में से कोई ले सकते है।" सदियों से यही तो करता आया हूँ। 

                   इस बार फिर उसकी बातों में एक पहेली थी , जिसको सुलझा पाने में आधुनिक सोच वालो की बस की बात नही थी। उन्हें तो सिर्फ मौज- मस्ती और पैसों की चिंता होती है बाकी इसके अलावा सबकुछ बकवास लगता है। बिल्कुल ऐसा ही रमेश और पूजा भी कल तक थे । लेकिन आज उनके सामने ऐसी परिस्थितिया थी जिसे सिर्फ पुरातन सोच और ज्ञान से ही सुलझाया जा सकता है। जो इनके पास न मात्रा में थी। 

                      अब पूजा बोलती है , "रमेश इस वाले रूम में चलते है ।" ये कमरा वो नही था जिससे वो व्यक्ति निकला बल्कि ये दूसरा कमरा था जिसकी हालत पहले वाले कमरे से कुछ अच्छी थी, शायद इसीलिये पूजा ने उसे ही चुना।

          रमेश भी हामी भरता है और दोनों एक दूसरे की सहमति से उस कमरे में प्रवेश कर जाते है। कमरा बिल्कुल अंधेरा था, रमेश ने उसी कमरे के कोने में पड़ी एक पुराने से लालटेन को जला दिया , और दरवाजे को बंद कर दिया ।

अब दोनों पति-पत्नी एक अनजान जगह के अनजान कमरे में बंद थे । दोनों जमीन पर ऐसे ही लेट गए लेकिन उनकी आँखों मे नींद नही थी दोनों ऐसे ही लेटे-लेटे कमरे के छत को देखे जा रहे थे। 
                         तभी पूजा बोल पड़ती है , "रमेश क्या हम सही जगह पर है?" 
       रमेश "पता नही कुछ मुझे भी समझ नही आ रहा " रमेश इतना ही बोलकर अपनी खामोशी को फिर से स्थिर कर लिया।। कुछ ही देर अभी लेटे-लेटे हुए थे कि तभी पूरा कमरा धुँआ से भर गया और इस धुंए के साथ-साथ एक अजीब सी गंध थी , दोनों घबरा कर उठे जैसे उनको लगा कि कमरे में ही आग लग गया हो। लेकिन ऐसा नही था, फिर पूजा कमरे के पीछे के तरफ खिड़की को खोलकर चुपके से बाहर के तरफ देखी ,सामने जो दृश्य था उसे देख मानो उसके पैरों तले जमीन निकल गई। वो बेहोश होते-होते बची , उसकी ये स्थिति देखकर रमेश भागा-भागा उसके पास आया और उसे संभालने की कोशिश करता है। कुछ सम्भलने के बाद पूजा ने रमेश को खिड़की से बाहर की ओर देखने का इशारा किया रमेश पूजा को संभालते हुए बाहर की ओर देखता है, सामने दो चिताएं धधकती हुई जल रही थी। जिसपर पूजा और रमेश की अधजली मृत्य शरीर उस चिता की धधकती ज्वाला में पूरी तरह राख होने को तैयार थे। लेकिन ये क्या उस मृत्य शरीर को जलाने वाला कोई और नही बल्कि उसे जलाना वाला वही ढाबे का पता बतलाने वाला बूढ़ा व्यक्ति था।
                 ये दृश्य रमेश को भी चकित कर गया , दोनों पति-पत्नी अपने आप को संसय भरे नजरो से देखने लगे । वो ये नजारा देखकर हैरान थे कि जीवित व्यक्तियों के आंखों के सामने उसी के शरीर चिताओं पर जल रहा है। उसके रोंगटे खड़े हो जाते है। दोनों के रोम-रोम भय से ऐसे कांपता है जैसे उसकी शरीर से प्राण ही निकल रहे हो । अब दोनों ने ये जगह छोड़ने की निश्चय किया और जैसे ही वो दरवाजे को ओर बढ़े तभी दरवाजा अपने-आप खुलता है और उनकी ओर अपने अंदर धड़कती अंगार लिए दो निगाहे बढ़ती है। ये तो बिल्कुल वैसा ही था जिसे रमेश गाड़ी के शीशे से देखा था। 
                   उसका शरीर पूरी तरह खून से लाल हो चुके थे , उसके गले पर चाकू से कटे हुए एक बड़ा निशान था जिससे खून की फहवारे उड़ रहे थे ऐसा लगता था जैसे इसे अभी ही किसी ने चाकू से मारा हो,उड़ते हुए खून के कुछ छीटे अब रमेश और पूजा के शरीर पर पड रहे थे और वो व्यक्ति अपनी इस भयानक काया को लेकर उनकी ओर मंद चाल से बढ़ते जा रहा था।अब रमेश ओर पूजा की आँखों मे डर के आँशु भर आये , वो जोर-जोर से रोते हुए उस लाल खून से सने आँखों मे अंगार लिए आदमी से अपनी जीवन की भीख माँगते है। हमेशा मौज-मस्ती और आधुनिक जीवन जीने वाला आज भगवान को जोर-जोर से पुकार रहें थे।
                      तभी एक बार फिर से बहुत जोरो से कड़कती आवाज के साथ बिजली चमकती है , और काले बादलों से मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। बारिश के वेग इतना प्रबल था की उसके प्रभाव से बाहर जल रहे चिता की लपटें शांत पड़े जा रही थी, लेकिन ये क्या चिता की अग्नि जैसे-जैसे कम होती जा रही थी वैसे-वैसे सामने खून से लथपथ व्यक्ति गायब होता जा रहा था। कुछ ही देर के बाद अब बारिश की बूंदे पूजा और रमेश पर भी आनी शुरू हो गए। चारो तरफ जो ढाबा और उसमें रह-रहे इन भयानक आत्माओं का साम्राज्य अब गायब हो रहे थे। कुछ ही पलों के बाद अब रमेश और पूजा उस वीरान घने जंगल के बीचों-बीचों से गुजरती सड़क के किनारे थे , और उनकी साथ था तो सिर्फ बारिश और ये घना जंगल एवं दूर एक पेड़ से टकराई उनकी गाड़ी।
                          अब इन दोनों को थोड़ी हिम्मत आयी , ये उसी जगह पर खड़े -खड़े उस ईश्वर को धन्यवाद दे रहे थे जिसे आज तक तो उन्होंने देखा न था और न ही माना था लेकिन अपनी मौजूदगी का एहसास कराया था। कुछ देर बारिश होने के बाद बन्द हो जाता है अब रात्रि समाप्त होने को थी दिन का पहला पहर की शुरुआत होने वाली थी। पूरब दिशा में आकाश का रंग लाल होने लगा , जिसे देख दोनों के अंदर एक नई ऊर्जा फिर से आई एक नई जीवन की शुरुआत के साथ। चारो दिशायें पक्षियों की चहचहाहट से गूंज उठा, मानो ऐसा प्रतीत हो रहा था की रमेश और पूजा की नई जीवन मिलने की खुशी में प्राकृतिक अपने मधुर गीत गा रही हो।
                            रमेश और पूजा आज पहली बार उगते सूर्य को प्रणाम करते है और एक नई जीवन की उम्मीद लिए एवं मन मे एक भयानक सपना को बसाए। प्रसन्न मुद्रा में अपनी कार में जाकर बैठते है। कार जो एक पेड़ से टकराई थी जो महज थोड़ी कोशीश में शुरू हो जाती है। और वो दोनों फिर से अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाते है।



                                                         समाप्त......।

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